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दिल्ली हाईकोर्ट की सख्ती: पतंजलि को ‘धोखा’ वाला च्यवनप्राश विज्ञापन तुरंत रोकने का आदेश

निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा पर चोट: अदालत ने पतंजलि का विवादित विज्ञापन हटवाया

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को उसके हालिया च्यवनप्राश विज्ञापन का प्रसारण, प्रकाशन या प्रचार करने से रोकते हुए एक कड़ा अंतरिम आदेश जारी किया है। इस विज्ञापन में अन्य सभी च्यवनप्राश ब्रांडों को “धोखा” बताकर व्यापक रूप से बदनाम किया गया था। अदालत की यह सख्ती डाबर इंडिया लिमिटेड की उस याचिका के बाद सामने आई है, जिसमें कंपनी ने पतंजलि पर उसके उत्पाद को ग़लत तरीके से पेश करने और उपभोक्ताओं को गुमराह करने का आरोप लगाया था।

विज्ञापन को ‘उत्पाद श्रेणी की निंदा’ करार

11 नवंबर 2025 को न्यायमूर्ति तेजस करिया ने अंतरिम आदेश में कहा कि पतंजलि का विज्ञापन केवल तुलनात्मक दावा नहीं करता, बल्कि संपूर्ण च्यवनप्राश श्रेणी को भ्रामक बताते हुए सीधे-सीधे निंदा करता है। अदालत ने माना कि ऐसे बयान बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाते हैं, खासकर जब डाबर च्यवनप्राश इस श्रेणी में 61% से अधिक हिस्सेदारी रखता है।

विज्ञापन में बाबा रामदेव द्वारा अन्य सभी ब्रांडों को “धोखा” कहा गया था और उपभोक्ताओं से केवल पतंजलि का उत्पाद चुनने की अपील की गई थी। अदालत ने इसे “अनुचित, भ्रामक और बाजार को प्रभावित करने वाला” कहा।

पतंजलि का बचाव खारिज

पतंजलि की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नायर ने तर्क दिया कि यह केवल ‘एड पफरी’ है, जो विज्ञापन में स्वीकार्य है, और किसी विशेष ब्रांड को निशाना नहीं बनाया गया था।
लेकिन अदालत ने यह तर्क अस्वीकार कर दिया, यह कहते हुए कि विज्ञापन का प्रभाव स्पष्ट रूप से पूरी श्रेणी को प्रभावित करता है और “धोखा” जैसे शब्द उपभोक्ता के विश्वास को नुकसान पहुंचाते हैं।

72 घंटे में सभी प्लेटफॉर्म से सामग्री हटाने का निर्देश

उच्च न्यायालय ने पतंजलि और उसके सहयोगियों को यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टीवी और सभी डिजिटल प्लेटफार्मों से 72 घंटों के भीतर विवादित विज्ञापन हटाने का आदेश दिया है। अदालत ने विज्ञापन को “अपमानजनक और स्वीकार्य विज्ञापन मानकों के विरुद्ध” माना।

अगली सुनवाई फरवरी 2026 में

मामले की अगली सुनवाई 26 फरवरी 2026 को होगी। अदालत ने कहा कि इस तरह के विज्ञापन नैतिक विज्ञापन सिद्धांतों और प्रतिस्पर्धा की निष्पक्षता का उल्लंघन करते हैं। इस मामले का परिणाम भविष्य में तुलनात्मक विज्ञापनों और ब्रांड प्रचार के नियमों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

निष्कर्ष

यह फैसला दिखाता है कि विज्ञापन में अतिशयोक्ति की भी सीमा होती है, और किसी संपूर्ण उत्पाद श्रेणी को बदनाम करना कानूनी रूप से अस्वीकार्य है। डाबर की याचिका ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता हित और बाज़ार की पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता है।

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