चार माह बाद दोबारा मोजो मशरूम में छापेमारी; फिर प्रशासनिक लापरवाही आई सामने
मानवाधिकार आयोग की जांच में खुला नेटवर्क, राजधानी से गांव तक फैला हो सकता है बाल श्रम का जाल
रायपुर। राजधानी में चार महीने के भीतर दूसरी बार हुई छापेमारी ने फिर एक बार चौंकाने वाला खुलासा कर दिया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने सोमवार को सड्डू (बिस्कुट) और खरोरा (मशरूम) इलाके की दो फैक्ट्रियों पर एक साथ कार्रवाई कर 109 नाबालिग मजदूरों को मुक्त कराया। इसमें 68 लड़कियां और 41 लड़के शामिल हैं।
जोकि अधिकांश बच्चे उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के रहने वाले हैं और कथित तौर पर बेहद खराब, दमघोंटू और शोषणकारी हालात में काम करते पाए गए।
इस संयुक्त कार्रवाई में मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो, महिला एवं बाल विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी संजय निराला, रायपुर एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की प्रमुख डीएसपी नंदिनी ठाकुर, जिला प्रशासन की टीम, और पुलिस विभाग—मौजूद रहे।
फैक्ट्रियों को तत्काल बंद करने के आदेश
निरीक्षण के दौरान आयोग की टीम ने देखा कि दोनों इकाइयों में सुरक्षा, भोजन, वेतन और आवास जैसी कोई भी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। बच्चों से वयस्कों जैसी भारी मजदूरी ली जा रही थी। आयोग ने मौके पर ही दोनों फैक्ट्रियों को तत्काल बंद करने के निर्देश दिए और विस्तृत जांच शुरू करने का आदेश दिया। रेस्क्यू किए गए सभी बच्चों को महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम द्वारा सुरक्षित केंद्रों में भेज दिया गया है। परिजनों से दस्तावेज बुलाए गए हैं, ताकि प्रत्येक बच्चे की वास्तविक उम्र प्रमाणित की जा सके।
नहीं हुई थी कोई कार्रवाई, मामला ठंडे बस्ते में
जुलाई में भी मोजो मशरूम फैक्ट्री से 97 नाबालिग मजदूर मुक्त कराए गए थे। तब बच्चों ने मारपीट, काम के घंटे बढ़ाने, मजदूरी रोकने, और अमानवीय रहने की स्थितियों—की पुष्टि की थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से न तो कोई प्राथमिकी दर्ज की गई और न ही आगे कोई सख्त कार्रवाई हुई। श्रम विभाग ने मजदूरों को बकाया दिलाया और मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया। यही लापरवाही अब दोबारा सामने आई स्थिति की बड़ी वजह मानी जा रही है।
मीडिया रिपोर्टों पर एनएचआरसी ने खुद लिया संज्ञान
जुलाई के बाद अनेक मीडिया रिपोर्टें लगातार यह सवाल उठाती रहीं कि इतने बड़े खुलासे के बाद भी फैक्ट्री पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इन्हीं रिपोर्टों को आधार मानकर मानवाधिकार आयोग ने स्वत: संज्ञान लिया और तीन महीने की विस्तृत प्रारंभिक जांच की। इसी जांच के बाद सोमवार को छापेमारी की गई, जिसमें पाया गया कि परिस्थितियां जुलाई जैसी ही बनी हुई थीं—बल्कि और खराब।
कठोर दण्ड लेकिन अनुपालन कमजोर
बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम 2016 के अनुसार—
क 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से कोई भी काम करवाना बिल्कुल निषिद्ध।
क 14-18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक उद्योगों में नियोजित करना अपराध।
क दण्ड: दो वर्ष तक कारावास, या 50 हजार रुपये तक जुर्माना, या दोनों।






