छत्तीसगढ़रायपुर। कृषि विषयाें काे लेकर देशभर में चर्चित व आईजीकेवी रायपुर के पूर्व कुलपति प्रो. एसके पाटिल से‘धान का कटोरा से ‘क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चरतक पर विशेष चर्चा। प्रस्तुत बातचीत के खास अंश
व्यवसाय खबर : क्या छत्तीसगढ़ ने कृषि विविधीकरण में ठोस सफलता हासिल की है?

उत्तर (प्रो. पाटिल): छत्तीसगढ़ ने धान उत्पादन और खरीदी में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है, परंतु विविधीकरण की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। आज भी 70′ से अधिक भूमि धान के अंतर्गत है। दलहन में 8-9′ वृद्धि हुई है, किंतु यह धान के विशाल रकबे के सामने सीमित है। दलहन की कम उत्पादकता (800-1000 किग्रा/हेक्टेयर) और प्रभावी खरीदी तंत्र के अभाव में किसान जोखिम नहीं लेता।
हालांकि उद्यानिकी क्षेत्र में क्रांतिकारी विस्तार हुआ है—92 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 8.5 लाख हेक्टेयर से अधिक। सब्जी, फल और फूल किसानों को 5-10 गुना अधिक आय दे रहे हैं। वास्तविक आय स्थिरीकरण में उद्यानिकी की भूमिका अधिक प्रभावी रही है। इसलिए मात्र-आधारित चावल नीति के बदलें, मूल्य संवर्धित और जलवायु-लचीली कृषि की ओर कदम बढ़ाना होगा।

व्यवसाय खबर: सिंचाई क्षमता में वृद्धि क्या जलवायु चुनौतियों के लिए पर्याप्त है?
उत्तर:सिंचाई क्षमता 2000 में 13.28 लाख हेक्टेयर थी, जो अब 21.40 लाख हेक्टेयर तक पहुँच गई है। यह उल्लेखनीय उपलब्धि है। परंतु वास्तविक सिंचाई केवल 11-12 लाख हेक्टेयर में हो रही है, यानी लगभग आधी क्षमता अनुपयोगी है।
जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अवधि घट रही है। ऐसे में केवल संरचनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं; सूक्ष्म सिंचाई, भूजल पुनर्भरण, स्टॉप डैम और खेत तालाब अनिवार्य हैं।

व्यवसाय खबर : एमएसपी और किसान योजनाओं का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: 3,100 प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी और ब्याज-मुक्त ऋण ने लघु एवं सीमांत किसानों को आय सुरक्षा दी है। साहूकारों पर निर्भरता कम हुई है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बढ़ा है।
परंतु यही नीति धान मोनोक्रॉपिंग को भी प्रोत्साहित कर रही है, जिससे दीर्घकाल में जल संकट गहरा सकता है।
व्यवसाय खबर: उत्पादकता और तकनीकी प्रगति को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर:खाद्यान्न उत्पादकता 900-1000 किग्रा/हेक्टेयर से बढ़कर 2300-2400 किग्रा/हेक्टेयर हो गई है। मक्का और धान में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। फिर भी यंत्रीकरण सीमित है, मृदा स्वास्थ्य कार्ड का उपयोग कम है, और उन्नत उपकरणों की उपलब्धता अपर्याप्त है। बीज और उर्वरकों तक प्रगति हुई है, पर ‘सटीक कृषि अभी प्रारंभिक अवस्था में है।

समापन में प्रो. पाटिल कहते हैं:
‘छत्तीसगढ़ को मात्र-आधारित चावल नीति से आगे बढ़कर जलवायु-लचीली, विविधीकृत और मूल्य-संवर्धित कृषि मॉडल अपनाना होगा। यही अगले 25 वर्षों की समृद्धि का आधार बनेगा।
व्यवसाय खबर: जैविक और प्राकृतिक खेती की चुनौतियाँ क्या हैं?
उत्तर: मुख्य समस्या बाजार और प्रमाणन है। तीन वर्ष की ‘कन्वर्जन अवधि में किसान को प्रीमियम मूल्य नहीं मिलता। जब तक जैविक उत्पादों के लिए अलग बाजार, ब्रांड और रूस्क्क जैसी व्यवस्था नहीं बनेगी, किसान बड़े पैमाने पर नहीं जुड़ेंगे। ‘अधिकतम जैविक, न्यूनतम रासायनिक मॉडल अधिक व्यावहारिक है।

व्यवसाय खबर: आने वाले 25 वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
उत्तर:जल संकट और अनियमित वर्षा सबसे बड़ी चुनौती है। धान पर अत्यधिक निर्भरता पारिस्थितिक दबाव बढ़ा रही है।
डायरेक्ट-सीडेड राइस, मिलेट्स, मक्का, दलहन-तिलहन और वर्षा जल संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। कृषि-पारिस्थितिक उपयुक्तता से जोड़ना समय की मांग है।
व्यवसाय खबर: कृषि-प्रसंस्करण के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर:धान मिलिंग के अतिरिक्त उद्यानिकी आधारित प्रोसेसिंग यूनिट, कोल्ड-चेन, प्री-कूलिंग सेंटर और मिनी फूड पार्क विकसित करने होंगे। स्नक्कह्र आधारित प्रसंस्करण मॉडल से किसानों को मूल्य संवर्धन का लाभ मिलेगा।

व्यवसाय खबर: युवाओं को खेती से कैसे जोड़ा जाए?
उत्तर:खेती को ‘बिजनेस मॉडल में बदलना होगा। एग्री-टेक स्टार्टअप, ड्रोन, प्रिसीजन फार्मिंग और वैल्यू एडिशन युवाओं को आकर्षित कर सकते हैं। जब खेती से नियमित और सम्मानजनक आय दिखेगी, तभी युवा इसे करियर के रूप में अपनाएंगे।
व्यवसाय खबर:जल सुरक्षा के लिए नवाचार क्या हों?
उत्तर:ड्रिप, स्प्रिंकलर, मल्चिंग और वर्षा जल संचयन अनिवार्य किए जाएँ। खेत तालाब, रिचार्ज पिट और सामुदायिक स्टॉप डैम जल स्तर बढ़ाने में सहायक होंगे।

व्यवसाय खबर: डिजिटल बाजार की क्या रणनीति होनी चाहिए?
उत्तर: बिचौलियों को हटाने के बजाय उन्हें ‘सेवा प्रदाता में बदलना चाहिए। लॉजिस्टिक्स, ग्रेडिंग और कोल्ड-चेन को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ना ही ‘फार्म-टू-फोर्क मॉडल की सफलता की कुंजी है।








