UGC Net 2026 Kya Hai: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 जारी किए हैं। ये नियम 2012 की एंटी-डिस्क्रिमिनेशन गाइडलाइंस की जगह लाए गए हैं।
लखनऊ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( UGC ) की ओर से लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम- 2026’ को लेकर विवाद गहरा गया है। उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक विवाद की गूंज सुनाई दे रही है। सवर्ण समाज इस बिल के विरोध में खड़ा हो गया है।
समानता को बढ़ावा देने और जातीय भेदभाव को खत्म करने वाले कानून को बड़े स्तर असमानता का कानून होने की दलील दी जा रही है। इसको लेकर लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले यूपी में पुलिस भर्ती परीक्षा में पेपर लीक का मामला ऐसा गरमाया था, युवा वर्ग नाराज हो गया।
नियमों के मुख्य उद्देश्य
UGC के नए नियम अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, महिलाओं, दिव्यांगों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव को रोकने पर केंद्रित हैं। इसमें भेदभाव को अनुचित व्यवहार, बहिष्कार या अवसरों से वंचित करना माना गया है। अब संस्थानों के लिए इन नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा और इसकी जिम्मेदारी सीधे संस्थान प्रमुख पर होगी।

- क्यों हो रहा है विरोध?
यूजीसी की ओर से यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर जातीय भेदभाव को खत्म करने के लिए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू किया गया हैं। 15 जनवरी 2026 से यह रेगुलेशन पूरे देश में यूजीसी से संबद्ध सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों प्रभावी हुआ है। सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों और समूहों ने इसके लागू होने के बाद ही विरोध शुरू किया था। दरअसल, नए रेगुलेशन में ओबीसी को भी जातीय भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया।
एससी और एसटी छात्रों को पहले से ही कई अधिकार मिले हुए थे। वे भी इस दायरे में आ गए हैं। नए कानून के तहत इनके साथ-साथ ओबीसी छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायत सक्षम पदाधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकते हैं।
- नए कोषांग के गठन के निर्देश
यूजीसी ओर से लागू किए गए रेगुलेशन के तहत यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर नए कोषांग का गठन किया जाना है। समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन हर संस्थान में एससी, एसटी और ओबीसी छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों के लिए किया जाना है। यूनिवर्सिटी लेवल पर समानता समिति होगी। इसमें एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिध सदस्य के तौर पर शामिल किए जाने हैं। हर छह माह में यह समिति रिपोर्ट तैयार कर यूजीसी को भेजेगी। इसके आधार पर यूनिवर्सिटी और कॉलेज की स्थिति को मापा जाएगा। - सवर्ण वर्ग को अलग-थलग किए जाने की साजिश?
मामले में सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस कानून में कोई भी एससी, एसटी, ओबीसी छात्र, शिक्षक या शिक्षकेतर कर्मचारी हमारे खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। इसके बाद हमें अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। बड़े स्तर पर इस नियम का दुरुपयोग किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों में कुलपति और कॉलेजों में प्राचार्य सभी छात्रों की शिकायतों पर जब सुनवाई करते हैं तो फिर नई व्यवस्था से असमानता ही फैलेगी। सवर्ण वर्ग को अलग-थलग किए जाने की साजिश के तौर पर इस कानून को पेश किया जा रहा है।
शिकायत आने पर क्या प्रक्रिया होगी?
EOC के अंतर्गत एक Equity Committee बनाई जाएगी, जिसमें SC, ST, OBC, महिलाएं और दिव्यांग प्रतिनिधि शामिल होंगे। शिकायत मिलते ही समिति बैठक करेगी और रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को देगी। हर संस्थान को 24 घंटे की इक्विटी हेल्पलाइन चलानी होगी। शिकायतकर्ता की पहचान मांगने पर गोपनीय रखी जाएगी।
सजा, संवैधानिक आधार और चुनौतियां
नियम न मानने पर UGC अनुदान रोक सकता है, नए कोर्स बंद कर सकता है और संस्थान को सूची से हटाया जा सकता है। ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 17 और 46 से जुड़े हैं। हालांकि आलोचकों का कहना है कि “अप्रत्यक्ष भेदभाव” की परिभाषा अस्पष्ट है, झूठी शिकायतों की आशंका है और संस्थानों पर प्रशासनिक दबाव बढ़ेगा।







