"Guru Maa has departed, but her teachings will always remain with me": Tears welled up in disciple Taruna Sahu's eyes as she remembered Teejan Bai.
रायपुर। विश्वविख्यात पंडवानी गायिका एवं पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन ने उनके शिष्यों और कला जगत को गहरे शोक में डुबो दिया है। उनकी शिष्या और वर्तमान में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) राजनांदगांव में निरीक्षक के पद पर कार्यरत तरुणा साहू ने गुरु मां को याद करते हुए भावुक शब्दों में कहा, “उन्होंने मुझे सिर्फ पंडवानी नहीं, बल्कि जीवन जीना सिखाया। मेरी पहचान, मेरा आत्मविश्वास और मेरी पूरी कला-यात्रा उन्हीं की देन है।”

तरुणा साहू ने बताया कि उनकी पहली मुलाकात वर्ष 1994 में हुई थी। उस समय वे धमतरी जिले के ग्राम गिधावा की रहने वाली एक साधारण छात्रा थीं और जवाहर नवोदय विद्यालय में कक्षा छठवीं में पढ़ती थीं। विद्यालय में आयोजित पंडवानी प्रशिक्षण शिविर में 200 से अधिक प्रतिभागियों के बीच गुरु मां ने उन्हें अपनी शिष्या के रूप में चुना। यही क्षण उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।
वे बताती हैं कि तीजन बाई केवल गुरु नहीं थीं, बल्कि मां की तरह उनका हर पल ख्याल रखती थीं। “वे अपने हाथों से खाना खिलाती थीं, मेरे बाल संवारती थीं, मेकअप करती थीं और अपने पास ही सुलाती थीं। उनके स्नेह में मुझे हमेशा मां का एहसास होता था।”
बचपन की एक प्यारी याद साझा करते हुए तरुणा मुस्कुराते हुए कहती हैं, “गुरु मां को पान खाने का बहुत शौक था। मुझे लगता था कि शायद पान खाए बिना पंडवानी नहीं गाई जा सकती। इसलिए मैं उनसे पहले पान मांगती थी। वे हंसते हुए मुझे पान देतीं और फिर मैं पूरे उत्साह से मंच पर गाने लगती थी।”

गुरु-शिष्या की यह जोड़ी देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर साथ नजर आई। दिल्ली, भोपाल, उज्जैन के कालिदास समारोह, रायपुर सहित अनेक सांस्कृतिक आयोजनों में तरुणा को गुरु मां के साथ प्रस्तुति देने का अवसर मिला। कई बार तीजन बाई एक प्रसंग का पहला हिस्सा गातीं और आगे की कथा अपनी शिष्या को सौंप देतीं। तरुणा कहती हैं, “यह मेरे प्रति उनके विश्वास और स्नेह का सबसे बड़ा प्रमाण था।”

आज आरपीएफ में निरीक्षक के रूप में जिम्मेदारी निभा रहीं तरुणा साहू मानती हैं कि वर्दी की गरिमा और मंच की मर्यादा—दोनों का पाठ उन्हें गुरु मां ने ही पढ़ाया। “उन्होंने सिखाया कि कला केवल गले में नहीं, बल्कि इंसान के चरित्र में भी दिखाई देनी चाहिए। देश की सेवा हो या लोकसंस्कृति की, दोनों को पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए।”
गुरु मां को अंतिम श्रद्धांजलि देते हुए तरुणा की आंखें भर आती हैं। वे कहती हैं, “मेरे लिए तीजन बाई जी सिर्फ विश्वविख्यात लोक कलाकार नहीं थीं। वे मेरी गुरु, मेरी मां, मेरी प्रेरणा और मेरी पहचान थीं। मैं जीवन भर गर्व से कहती रहूंगी—’मैं पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई जी की शिष्या हूं।’ यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है।”
डॉ. तीजन बाई के निधन के साथ भले ही पंडवानी की एक अमर आवाज मौन हो गई हो, लेकिन उनकी दी हुई सीख, संस्कार और कला उनकी शिष्यों की आवाज में आने वाली पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी।







