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अजित पवार का सियासी सफर:20 साल की उम्र में ले ली थी राजनीति में एंट्री

महाराष्ट्र की सियासत के दिग्गज नेता अजित पवार का दुखद प्लेन हादसे में निधन हो गया

Desk Team |
महाराष्ट्र की सियासत के दिग्गज नेता अजित पवार का दुखद प्लेन हादसे में निधन हो गया। बारामती में एक जनसभा के लिए गए अजित का प्लेन लैंडिग के वक्त दुर्घटना का शिकार हो गया। 20 साल की उम्र से राजनीति में एंट्री लेने वाले अजित पवार छठी बार सूबे के डिप्टी सीएम थे।महाराष्ट्र की सियासत के दिग्गज नेता अजित पवार का दुखद प्लेन हादसे में निधन हो गया। बारामती में एक जनसभा के लिए गए अजित का प्लेन लैंडिग के वक्त दुर्घटना का शिकार हो गया। 20 साल की उम्र से राजनीति में एंट्री लेने वाले अजित पवार छठी बार सूबे के डिप्टी सीएम थे।

Ajit Pawar Political Journey: महाराष्ट्र के कद्दावर नेता और सबसे लंबे समय तक सूबे के डिप्टी सीएम रहने वाले गैर भाजपाई नेता अजित पवार का आज एक प्लेन हादसे में निधन हो गया। वे बारामती में एक जनसभा के लिए जा रहे थे जब यह हादसा हुआ। उनके अलावा विमान में पांच और लोग भी सवार थे, इस दुखद हादसे में कोई भी जिंदा नहीं बच सका। हादसे के बाद सामने आए वीडियो में पूरा प्लेन जलकर खाक हो गया है। उनके निधन के बाद पूरे देश में शोक की लहर है। महाराष्ट्र के लोग अपने नेता की मौत से गमगीन हैं। 20 साल की उम्र से राजनीति में एंट्री लेने वाले अजित पवार 6 बार सूबे के डिप्टी सीएम रहे। आइए जानते हैं उनके राजनीतिक जीवन के बारे में…

कैसा रहा अजित पवार का शुरुआती जीवन

अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में अपने दादा-दादी के घर हुआ था। वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के संस्थापक और दिग्गज नेता शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार और आशाताई पवार के पुत्र थे। उनके पिता वी. शांताराम मुंबई के प्रसिद्ध राजकमल स्टूडियो में कार्यरत थे। पारिवारिक माहौल और राजनीतिक विरासत ने अजित पवार को कम उम्र में ही सार्वजनिक जीवन की ओर आकर्षित किया। उनका विवाह सुनेत्रा पवार से हुआ,जिनसे उनके दो बेटे हैं, जय और पार्थ पवार।

चाचा शरद पवार के प्रभाव और मार्गदर्शन में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाई। संघर्ष और जमीनी राजनीति के दम पर अजित पवार महाराष्ट्र की सत्ता राजनीति के अहम चेहरे बने और उप मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे, हालांकि वे कभी सीएम न बन पाए। अपनी तेज-तर्रार शैली और साफ-गोई के कारण वे समर्थकों के बीच ‘दादा’ के नाम से खासे लोकप्रिय रहे।

कितना पढ़े लिखे थे अजित

शैक्षणिक जीवन की बात करें तो अजित पवार ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई देओली प्रवर से की। इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र राज्य शिक्षा बोर्ड से माध्यमिक शिक्षा पूरी की। फिर पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और परिवार की मदद के लिए काम करने लगे। अजित की औपचारिक रूप से पढ़ाई भले ही माध्यमिक स्तर तक सीमित रही हो, लेकिन राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक समझ ने उन्हें राज्य की राजनीति में एक मजबूत और प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया।

20 साल की उम्र में शुरू हुआ राजनीतिक सफर

अजित पवार के राजनैतिक जीवन की शुरुआत चाचा शरद पवार के नक्शेकदम पर चल कर हुई। हालांकि कहते हैं कि वे फिल्म इंडस्ट्री में भी अपना करियर बना सकते थे, लेकिन उन्होंने पिता से अलग हो राजनीति को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाया। अजित ने 1982 में सार्वजनिक जीवन में कदम रखा। उस समय उनकी उम्र 20 साल थी। राजनीति की उनकी शुरुआत सहकारिता क्षेत्र से हुई,जब वे एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड के लिए चुने गए। इसके बाद 1991 में वे पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और करीब 16 वर्षों तक इस अहम पद पर बने रहे। सहकारिता क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ ने उन्हें ग्रामीण राजनीति में एक प्रभावशाली चेहरा बना दिया।

पहली बार 1991 में लड़ा चुनाव और संसद पहुंचे

अजित पवार ने 1991 में बारामती लोकसभा सीट से पहली बार संसद में प्रवेश किया। हालांकि बाद में उन्होंने यह सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए खाली कर दी। फिर वह उसी वर्ष बारामती विधानसभा से ही महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए। नवंबर 1992 से फरवरी 1993 तक कृषि और बिजली राज्य मंत्री रहे। वे बारामती विधानसभा क्षेत्र से अब तक सात बार महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने जा चुके हैं। उनकी पहली जीत 1991 के उपचुनाव में हुई और इसके बाद उन्होंने 1995, 1999, 2004, 2009 और 2014 और फिर 2019 और 2024 में लगातार जीत दर्ज कर क्षेत्र में अपना दबदबा कायम रखा।

अजित पवार ने अपने राजनीतिक करियर में कृषि एवं विद्युत राज्य मंत्री, मृदा संरक्षण, विद्युत व योजना राज्य मंत्री, सिंचाई मंत्री, ग्रामीण विकास मंत्री (अतिरिक्त प्रभार) और जल संसाधन मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाले। वे बारामती विधानसभा क्षेत्र से सात बार महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए।

पहली बार कब बने डिप्टी सीएम

अजित पवार को महाराष्ट्र की राजनीति का महत्वाकांक्षी और प्रभावशाली नेता माना जाता है। 2010 में वे पहली बार उप मुख्यमंत्री बने। 2013 में सिंचाई घोटाले के आरोपों के चलते उन्होंने इस्तीफा दिया,लेकिन बाद में क्लीन चिट मिलने पर दोबारा पद पर लौटे। इसे बाद वे छह बार राज्य के डिप्टी सीएम रहे। वे महाराष्ट्र के पहले ऐसे नेता हैं, जो सबसे लंबे समय तक सूबे का डिप्टी सीएम रहा।

शरद पवार से अलग हुए फिर साथ आए और फिर छोड़ा साथ

नवंबर 2019 में शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने एनसीपी से अलग होकर भाजपा के साथ सरकार बनाई और देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में उप मुख्यमंत्री बने। हालांकि,राजनीतिक घटनाक्रम के बाद यह सरकार 80 घंटे से भी कम समय में गिर गई,जिसके बाद अजित पवार ने इस्तीफा दे दिया और फिर एनसीपी में वापस लौट आए। इसके बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में बनी महा विकास अघाड़ी सरकार में अजित पवार को दोबारा उप मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि 2022 में शिवसेना में फूट के चलते एमवीए सरकार गिर गई और इसके बाद नई सरकार में अजित फिर उसी पद पर काबिज हो गए।

अजित पवार कब कब बने उप मुख्यमंत्री

  • 10 नवंबर 2010 – 25 सितंबर 2012 (पृथ्वीराज चव्हाण रहे सीएम)
  • 25 अक्तूबर 2012 – 26 सितंबर 2014 (पृथ्वीराज चव्हाण रहे सीएम)
  • 23 नवंबर 2019 – 26 नवंबर 2019 (देवेंद्र फडणवीस रहे सीएम)
  • 30 दिसंबर 2019 – 29 जून 2022 (उद्धव ठाकरे रहे सीएम)
  • 2 जुलाई 2023 – दिसंबर 2024 (एकनाथ शिंदे और फिर देवेंद्र फडणवीस रहे सीएम)
  • वह दिसंबर 2024 से देवेंद्र फडणवीस सरकार में एकनाथ शिंदे के साथ महाराष्ट्र के 8वें उप मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

हमेशा एक कदम दूर ही रही सीएम की कुर्सी

महाराष्ट्र में कैसी भी राजनीतिक उठा-पटक हुई हो किसी की भी सरकार रही हो, लेकिन अजित पवार को हमेशा एक महात्वाकांक्षी नेता के तौर पर देखा गया, सभी यह मानते थे कि उनके पास राज्य के सीएम बनने वाले सभी गुण मौजूद हैं। बावजूद इसके अजित के साथ यह विरोधाभास हमेशा रहा कि वे सीएम नहीं बन सके। तमाम राजनीतिक अनुभव, राज्य में हर दल के बीच व्यापक स्वीकार्यता के बावजूद सीएम की कुर्सी हमेशा उनसे दूर ही रही भले ही वे कई अन्य नेताओं के लिए सत्ता की चाभी बने रहे। हालांकि कोई इस बात से नहीं इनकार कर सकता कि भले ही अजित सूबे के सीएम न बन सके हों लेकिन उनकी धाक हमेशा सीएम के बराबर ही रही।

शरद पवार का बेटा होता तो…

अपनी सीएम बनने की इच्छा के बारे में एक बार तो अजित पवार ने यहां तक कह दिया था कि अगर वो शरद पवार के बेटे होते तो उन्हें सीएम बनने का मौका मिल जाता। उन्होंने कहा था, अगर मैं शरद पवार का बेटा होता तो मुझे यह मौका मिलता। सिर्फ इसलिए कि मैं उनका बेटा नहीं हूं, इसलिए मुझे यह अवसर नहीं दिया गया।’ राजनीतिक जानकार बताते हैं कि साल 2004 के चुनावों में एनसीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी, बावजूद इसके एनसीपी ने सीएम पद के लिए अपनी दाबेदारी नहीं पेश की थी। शायद उसका कारण अजित को पार्टी में नंबर दो का रुतबा हासिल करने से रोकना था, हालांकि इस पर एनसीपी के किसी नेता ने खुलकर कभी कुछ नहीं कहा।

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