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शहीद गुंडाधुर की धरती पर बदलाव की नई इबारत, सुरक्षा कैंप बने सेवा के केंद्र

धनंजय राठौर | संयुक्त संचालक, जनसंपर्क संचालनालय, रायपुर

कभी नक्सल हिंसा के साये में जीने वाले गांवों तक पहुंच रहीं सरकारी योजनाएं, सेवा डेरा से ग्रामीणों को मिल रहीं डिजिटल, बैंकिंग और रोजगार की सुविधाएं

नेतानार से बदल रही बस्तर की तस्वीर, पारंपरिक हुनर को मिल रहा बाजार और आत्मनिर्भरता को नए पंख

रायपुर । बस्तर की धरती ने संघर्ष का लंबा दौर देखा है। कभी नक्सल हिंसा और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जिन गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना बड़ी चुनौती हुआ करता था, आज उन्हीं गांवों में विकास, विश्वास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है। जिन इलाकों में कभी भय और असुरक्षा का माहौल था, वहां अब सुरक्षा कैंप जनसेवा और विकास के केंद्र के रूप में नई पहचान बना रहे हैं।

शासन और जनता के बीच भरोसे का रिश्ता

इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण तस्वीर बस्तर जिले के नेतानार में दिखाई देती है। यहां सुरक्षा कैंप परिसर में स्थापित शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा अब ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं, डिजिटल सुविधाओं, बैंकिंग सेवाओं और कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने का माध्यम बन रहा है। यह पहल केवल सुविधाएं उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन और जनता के बीच भरोसे का रिश्ता मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।

70 कैंपों को इस स्वरूप में विकसित किया जा रहा

बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थापित लगभग 200 सुरक्षा कैंपों को शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा के रूप में विकसित करने की योजना पर काम किया जा रहा है। पहले चरण में 70 कैंपों को इस स्वरूप में विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य दूरस्थ गांवों के लोगों को उनके आसपास ही जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है।

शहीद गुंडाधुर की धरती से विकास का संदेश

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह

नेतानार केवल एक गांव नहीं, बल्कि बस्तर के गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह महान जननायक शहीद वीर गुंडाधुर की जन्मस्थली है, जिन्होंने वर्ष 1910 के ऐतिहासिक भूमकाल विद्रोह में अंग्रेजी सत्ता के शोषण के खिलाफ आदिवासी समाज के स्वाभिमान, अधिकारों और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष किया था।

आज उसी ऐतिहासिक धरती पर स्थापित सेवा डेरा एक नए दौर का प्रतीक बन रहा है। जहां कभी अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष की आवाज उठी थी, वहीं अब शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल सेवाओं, आजीविका और आर्थिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से बेहतर भविष्य की राह तैयार की जा रही है।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने 18 मई 2026 को बस्तर जिले के नेतानार स्थित सीआरपीएफ कैंप परिसर में देश के पहले शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा जन सुविधा केंद्र का उद्घाटन किया था। अब इस पहल को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

छोटी-छोटी जरूरतों के लिए नहीं लगाने पड़ते चक्कर

दूरस्थ अंचलों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए आधार कार्ड बनवाना, बैंकिंग संबंधी काम कराना या आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र हासिल करना पहले काफी कठिन होता था। कई बार इन कामों के लिए ग्रामीणों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। इससे समय और धन दोनों खर्च होते थे।

सेवा डेरा ने इस परेशानी को कम करने की दिशा में नई राह दिखाई है। यहां आधार कार्ड बनवाने और अपडेट कराने, मोबाइल नंबर लिंक करने, केवाईसी तथा जन्म-मृत्यु, आय और जाति प्रमाण पत्र जैसी ऑनलाइन सेवाओं को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।

इन सुविधाओं से ग्रामीणों को अपने जरूरी कामों के लिए दूरस्थ शहरी केंद्रों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल रही है। शासन की योजनाओं की जानकारी और विभिन्न सेवाओं तक पहुंच आसान होने से ग्रामीणों के लिए विकास की प्रक्रिया में भागीदारी भी सुगम हो रही है।

बैंक सखी बन रहीं ग्रामीण महिलाओं की ताकत

सेवा डेरा की एक खास उपलब्धि बैंकिंग सेवाओं को गांवों के करीब लाना है। महिलाओं को बैंक सखी के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि वे ग्रामीणों को पैसे निकालने, जमा करने और बैंकिंग से जुड़ी दूसरी सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद कर सकें।

इस पहल से एक ओर ग्रामीणों को बैंकिंग सेवाओं के लिए दूर जाने की जरूरत कम हो रही है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के लिए रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता के अवसर भी बन रहे हैं।

सेवा डेरा के माध्यम से स्वास्थ्य परामर्श, आंगनबाड़ी और प्राथमिक शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच बेहतर बनाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। इस तरह ये केंद्र ग्रामीण जीवन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बहुआयामी जनसेवा केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।

इमली के प्रसंस्करण से बढ़ेगी महिलाओं की आमदनी

बस्तर की विकास यात्रा में महिलाओं की भागीदारी एक महत्वपूर्ण पहलू है। यहां स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल को आजीविका से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। नेतानार में गुंडाधुर महिला स्व-सहायता समूह की महिलाएं इमली का प्रसंस्करण कर उच्च गुणवत्ता वाला इमली पल्प तैयार कर रही हैं।

समूह की सदस्य लंबी नाग बताती हैं कि इस काम से जुड़कर महिलाएं सालाना एक लाख रुपये तक की आय अर्जित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध वन उपज का प्रसंस्करण महिलाओं के लिए आमदनी के नए अवसर पैदा कर रहा है।

इस पहल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इससे स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो रहा है और महिलाओं को केवल पारंपरिक गतिविधियों तक सीमित रहने के बजाय उद्यमिता की ओर बढ़ने का अवसर मिल रहा है।

सेवा डेरा से ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आ रहे बदलाव की एक और तस्वीर सुखदेवी के अनुभव में दिखाई देती है। अब उन्हें अपनी छोटी बच्ची का आधार कार्ड बनवाने के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। उनके लिए यह सुविधा भले ही एक छोटा बदलाव हो, लेकिन दूरस्थ गांवों में रहने वाले परिवारों के लिए ऐसी सहूलियतें समय, श्रम और खर्च बचाने में महत्वपूर्ण साबित होती हैं।

परंपरा भी सुरक्षित, रोजगार के नए रास्ते भी

बस्तर की पहचान उसकी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली से जुड़ी है। सेवा डेरा की पहल में इस विरासत को आजीविका के अवसरों से जोड़ने का प्रयास भी शामिल है।

यहां पारंपरिक ढेंकी से चावल तैयार कर उसकी बिक्री की जा रही है। इससे महिलाओं को अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिल रहा है। वहीं धान की भूसी का उपयोग पशु आहार के रूप में किया जा रहा है, जिससे स्थानीय संसाधनों का उपयोग भी बेहतर ढंग से हो रहा है।

इसके साथ ही महिलाओं को सिलाई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे अपने कौशल के आधार पर रोजगार हासिल कर सकें और स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकें।

इन प्रयासों की खासियत यह है कि विकास के नाम पर स्थानीय परंपराओं से दूरी बनाने के बजाय उन्हें आधुनिक जरूरतों और बाजार की संभावनाओं से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।

बस्तर के उत्पादों को मिलेगी नई पहचान

किसी भी स्थानीय उत्पाद को बड़े बाजार तक पहुंचाने के लिए उसकी गुणवत्ता के साथ आकर्षक पैकेजिंग, प्रभावी ब्रांडिंग और बाजार की मांग के अनुरूप प्रस्तुति भी जरूरी होती है। इसी दिशा में नेतानार में तैयार होने वाले उत्पादों को बेहतर पहचान दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

हाल ही में अहमदाबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन की टीम ने नेतानार पहुंचकर सिलाई, इमली प्रसंस्करण और पारंपरिक ढेंकी से चावल तैयार करने की गतिविधियों का जायजा लिया। टीम ने उत्पादों की पैकेजिंग और ब्रांडिंग को बेहतर बनाने के संबंध में चर्चा की।

यदि इन प्रयासों को बाजार से प्रभावी ढंग से जोड़ा जाता है, तो बस्तर की महिलाओं द्वारा तैयार उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है। इससे स्थानीय उत्पादों की पहचान मजबूत होने के साथ महिला स्व-सहायता समूहों की आय बढ़ाने की संभावनाएं भी विकसित होंगी।

विकास की मुख्यधारा से जुड़ता बस्तर

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार बस्तर के दूरस्थ क्षेत्रों तक बुनियादी सुविधाएं और विकास योजनाएं पहुंचाने पर जोर दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संकल्प का उल्लेख करते हुए राज्य सरकार बस्तर को नक्सलवाद के प्रभाव से बाहर निकालकर विकसित जनजातीय क्षेत्र के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयासरत है।

‘नियद नेल्ला नार’ योजना के माध्यम से सुदूर अंचलों में सड़क, बिजली, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के विस्तार पर ध्यान दिया जा रहा है। कृषि, पशुपालन और सिंचाई से संबंधित योजनाओं के जरिए ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।

ऐसे में शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा जैसी पहल विकास योजनाओं को अंतिम छोर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सुरक्षा, सुशासन और जनसेवा को एक साथ जोड़ने वाला यह मॉडल ग्रामीणों की जरूरतों के अनुरूप सुविधाएं उपलब्ध कराने का माध्यम बन रहा है।

सुरक्षा कैंप से सेवा डेरा तक, भरोसे के नए सफर की कहानी

बस्तर में बदलाव की यह कहानी केवल भवनों, सड़कों या सुविधाओं के विस्तार की कहानी नहीं है। यह उन गांवों तक शासन की पहुंच बढ़ाने की कहानी है, जहां भौगोलिक कठिनाइयों और लंबे समय तक बनी असुरक्षा के कारण विकास की गति प्रभावित रही।

शहीद गुंडाधुर की ऐतिहासिक धरती पर शुरू हुई यह पहल अतीत के संघर्ष और भविष्य की संभावनाओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभर रही है। सेवा डेरा के माध्यम से ग्रामीणों को सुविधाएं, महिलाओं को आजीविका के अवसर और पारंपरिक उत्पादों को बाजार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

इस यात्रा की असली सफलता तब होगी, जब इन केंद्रों के माध्यम से मिलने वाली सुविधाएं नियमित और प्रभावी रूप से ग्रामीणों तक पहुंचेंगी, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के स्थायी अवसर बनेंगे और विकास का लाभ दूरस्थ गांवों के प्रत्येक परिवार तक पहुंचेगा।

शहीद गुंडाधुर की धरती पर सुरक्षा कैंपों का सेवा डेरा में बदलना बस्तर में बदलती प्राथमिकताओं का प्रतीक है। यह उस भविष्य की ओर बढ़ता कदम है, जहां विकास के साथ विश्वास, परंपरा के साथ आधुनिकता और सरकारी योजनाओं के साथ स्थानीय लोगों की भागीदारी मिलकर बस्तर की नई पहचान गढ़ेंगी।

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