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कविता हृदय की, गद्य तर्क और विचार की भाषा : वरिष्ठ कवि और पत्रकार राजकुमार धर द्विवेदी

बचपन अनुशासन और राष्ट्रवाद से ओतप्रोत वातावरण में बीता

Poetry is the language of the heart, prose is the language of logic and thought: Senior poet and journalist Rajkumar Dhar Dwivedi

रायपुर। दूरदर्शन के लोकप्रिय कार्यक्रम कलम कल्पना के अंतर्गत 12 अप्रैल को शाम 4:30 बजे वरिष्ठ कवि और पत्रकार राजकुमार धर द्विवेदी का विशेष साक्षात्कार प्रसारित किया जाएगा। यह साक्षात्कार वरिष्ठ पत्रकार शशांक खरे ने लिया है, जबकि कार्यक्रम के निर्माता दूरदर्शन रायपुर के अधिकारी बालकृष्ण श्रीवास्तव हैं।

इस विशेष बातचीत में द्विवेदी ने साहित्य, समाज और भाषा पर गहन विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि “कविता हृदय की भाषा है, जबकि गद्य तर्क और विचार की भाषा है।” उनके अनुसार, जब भावनाएं चरम पर होती हैं तो वे कविता बनती हैं, और जब विचार समाज की विसंगतियों से टकराते हैं तो गद्य का रूप ले लेते हैं।

जड़ों से जुड़ा साहित्य ही सार्वभौमिक

द्विवेदी ने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका बचपन अनुशासन और राष्ट्रवाद से ओतप्रोत वातावरण में बीता। सेना में कार्यरत पिता से मिली वीरता की प्रेरणा और मां से मिले लोक-संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व और लेखन को आकार दिया। रीवा में उच्च शिक्षा के दौरान साहित्यिक माहौल ने उनके रचनात्मक दृष्टिकोण को विस्तार दिया।
उन्होंने कहा कि बघेलखंड की मिट्टी और छत्तीसगढ़ की ऊर्जा दोनों का असर उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। उनके अनुसार, आंचलिकता साहित्य की आत्मा होती है, और जो साहित्य अपनी जड़ों से जुड़ा होता है, वही वैश्विक स्तर पर भी प्रभावी बनता है।

कविता और गद्य—एक ही सिक्के के दो पहलू

द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि उनके लिए कविता और गद्य अलग-अलग विधाएं नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति के दो माध्यम हैं। कविता जहां कम शब्दों में गहरी संवेदना व्यक्त करती है, वहीं गद्य सामाजिक मुद्दों पर विस्तार से विचार रखने का अवसर देता है।

वरिष्ठ और पत्रकार राजकुमार धर द्विवेदी

उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत को याद करते हुए बताया कि बचपन में ही कविता लेखन की प्रेरणा मिली, लेकिन औपचारिक रूप से उनकी यात्रा 1985 में आकाशवाणी रीवा से शुरू हुई। 1986 से उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘एक कली मधुमास की’ और ‘बिना मुखौटे का आदमी’ शामिल हैं।

साहित्य: दर्पण ही नहीं, दीपक भी

समकालीन साहित्य पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य केवल समाज का दर्पण नहीं, बल्कि दीपक भी होना चाहिए, जो दिशा दिखाए। आज का साहित्य आम आदमी के संघर्ष—रोटी, रोजगार, टूटते रिश्ते और तकनीकी बदलावों की पीड़ा—को अभिव्यक्त कर रहा है, जिससे वह समाज के और अधिक करीब हुआ है।

छत्तीसगढ़ी साहित्य का उज्ज्वल भविष्य

छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की संभावनाओं पर उन्होंने विश्वास जताते हुए कहा कि “छत्तीसगढ़ी साहित्य का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।” यहां की लोक परंपराएं, गीत-संगीत और त्योहारों में समृद्ध काव्य परंपरा मौजूद है। नई पीढ़ी अपनी भाषा को गर्व के साथ अपना रही है, जो इसके विकास का सकारात्मक संकेत है।उन्होंने उम्मीद जताई कि शासन और समाज के सहयोग से छत्तीसगढ़ी भाषा राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत पहचान बनाएगी।

1 Comment

  1. Rajkumar Dhar Dwivedi says:

    वाह, धन्य हुआ। बहुत ही अच्छा। सादर नमन।

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