ताजा खबरअपडेटएजुकेशनखेतीजागरूक करने जैसे कार्यसमाचार

पूर्वोत्तर भारत में पोषणीय सुरक्षा और सतत कृषि की नई उम्मीद बना ‘श्री अन्न’

मिलेट खेती से बढ़ेगी किसान आय, मजबूत होगी पोषणीय सुरक्षा: डॉ. संजय कुमार पाण्डेय

बासर (अरुणाचल प्रदेश)। बदलते जलवायु परिदृश्य, पोषण संबंधी चुनौतियों और सतत कृषि की आवश्यकता के बीच मिलेट (श्री अन्न) पूर्वोत्तर भारत के लिए एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहा है। रागी, बाजरा, ज्वार, कोदो, सांवा और कांगनी जैसे मोटे अनाज न केवल पोषण से भरपूर हैं, बल्कि कम संसाधनों में भी सफलतापूर्वक उत्पादन देने की क्षमता रखते हैं।

खेती लंबे समय से पारंपरिक रूप से की जाती रहीआईसीएआर-आरसी फॉर एनईएच रीजन, अरुणाचल प्रदेश केंद्र, बासर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक (शस्य विज्ञान) डॉ. संजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि भारत विश्व का प्रमुख मिलेट उत्पादक देश है। पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर अरुणाचल प्रदेश के पर्वतीय एवं जनजातीय क्षेत्रों में इनकी खेती लंबे समय से पारंपरिक रूप से की जाती रही है।

डॉ. पाण्डेय ने कहा कि “श्री अन्न केवल एक फसल नहीं, बल्कि पोषणीय सुरक्षा, जलवायु अनुकूल कृषि, किसान आय वृद्धि और सतत विकास का सशक्त माध्यम है। इसके व्यापक प्रचार-प्रसार से पूर्वोत्तर भारत में कृषि और पोषण दोनों क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव संभव है।”

प्रोटीन और आहार फाइबर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैंउन्होंने कहा कि रागी (फिंगर मिलेट) को “न्यूट्री-सीरियल” और “सुपर फूड” के रूप में पहचान मिली है। इसमें कैल्शियम, आयरन, जिंक, प्रोटीन और आहार फाइबर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होने के कारण यह मधुमेह नियंत्रण में भी सहायक माना जाता है, जबकि ग्लूटेन-मुक्त होने से यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के लिए बेहतर विकल्प बन गया है।

सीमांत भूमि में भी आसानी से उगाई जा सकती डॉ. पाण्डेय के अनुसार मिलेट फसलें कम पानी, कम उर्वरक और सीमांत भूमि में भी आसानी से उगाई जा सकती हैं। सूखा और जलवायु परिवर्तन जैसी परिस्थितियों के प्रति इनकी सहनशीलता इन्हें वर्षा आधारित एवं पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती है। चावल आधारित कृषि प्रणालियों में मिलेट को शामिल करने से फसल विविधीकरण, मिट्टी की उर्वरता, पोषणीय सुरक्षा और उत्पादन स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।

खेतों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देना होगाउन्होंने बताया कि पूर्वोत्तर भारत में मिलेट उत्पादन बढ़ाने के लिए वीएल मांडुआ-376, वीएल मांडुआ-380, जीपीयू-28 और जीपीयू-48 जैसी उन्नत किस्मों के साथ गुणवत्तायुक्त बीज, वैज्ञानिक खेती, उचित पोषक तत्व प्रबंधन तथा एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधनन तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है। किसानों के क्षमता निर्माण और खेतों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देना होगा।

आय बढ़ाने के नए अवसर सृजित कर रही हैविशेषज्ञों का मानना है कि मिलेट आधारित मूल्य संवर्धित उत्पादों जैसे आटा, बिस्किट, कुकीज और रेडी-टू-ईट खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग किसानों के लिए आय बढ़ाने के नए अवसर सृजित कर रही है। साथ ही पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक मिलेट किस्मों का संरक्षण कृषि जैव विविधता को सुरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

समाज में कुछ बेहतर और उससे ज्यादा नवाचार की खबरे। व्यवसाय खबर डॉट कॉम का लक्ष्य नकारात्मक के बजाय सकारात्मक खबरों से समाज के हर वर्ग जागरूक किया जाय । पुरी कोशिश की सही और निष्पक्ष-मंथन के बाद खबरे वेबसाइट पर प्रकाशित हो।। पत्रकारिता से गहरा लगाव, सोच यही…

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts

Load More Posts Loading...No More Posts.