राष्ट्रीय एकता दिवस विशेष लेख
राष्ट्रीय एकता केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, समान अवसर और सामाजिक सद्भाव का भी प्रतीक

संयुक्त संचालक, जनसंपर्क
रायपुर। भारत की पहचान उसकी विविधता और एकता में निहित है। यहा अनेक भाषाए बोली जाती हैं, विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं का पालन किया जाता है, फिर भी देशवासियों को एक सूत्र में बाधने वाली भावना राष्ट्रीय एकता है। यह एकता केवल देश की सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ यह भी है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं को देश के साझा भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा महसूस करे।
हर वर्ष 31 अक्टूबर को लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। यह दिवस उनके ऐतिहासिक योगदान को स्मरण करने के साथ ही हमें देश की एकता, अखंडता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के अपने दायित्वों का एहसास कराता है। आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब सरदार पटेल के विचार और उनका दृढ़ नेतृत्व पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
सरदार पटेल ने रखी एकीकृत भारत की मजबूत नींव
वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के समय भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय कराना था। देश की राजनीतिक एकता सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता और कुशल नेतृत्व की आवश्यकता थी। ऐसे समय में देश के पहले उपप्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

वी. पी. मेनन और अन्य अधिकारियों के सहयोग से सरदार पटेल ने संवाद, कूटनीति और दृढ़ संकल्प के माध्यम से रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। उनके नेतृत्व में अधिकांश देशी रियासतें भारतीय संघ में शामिल हुईं और एक एकीकृत राष्ट्र के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। उनके प्रयासों ने भारत की राजनीतिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता को मजबूत आधार प्रदान किया।
सरदार पटेल का योगदान केवल रियासतों के विलय तक सीमित नहीं था। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना और विभिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों के बीच विश्वास कायम करना आवश्यक है। उनकी विरासत आज भी हमें सिखाती है कि दृढ़ नेतृत्व, आपसी सहयोग और साझा राष्ट्रीय संकल्प से बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है।
वर्ष 2014 से सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में विशेष रूप से मनाया जा रहा है। इस अवसर पर ‘रन फॉर यूनिटी’, राष्ट्रीय एकता की शपथ और विभिन्न जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से देशवासियों को एकता और अखंडता का संदेश दिया जाता है।
विकास के साथ एकता को मजबूत करना भी जरूरी
आज भारत के सामने चुनौती रियासतों को एकजुट करने की नहीं, बल्कि विकास के लाभों को देश के प्रत्येक क्षेत्र और नागरिक तक पहुँचाने की है। सड़क, रेल, बिजली, संचार और डिजिटल सुविधाओं का विस्तार दूरस्थ क्षेत्रों को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ रहा है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, व्यापार और उद्यमिता के अवसर बढ़ रहे हैं।
हालाँकि, केवल बुनियादी ढाँचे का विकास राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि प्रत्येक क्षेत्र और समुदाय को विकास के समान अवसर मिलें, सार्वजनिक सेवाएँ सुलभ हों और नागरिकों की आवश्यकताओं को उचित महत्व दिया जाए।
जब विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचता है, तब लोगों का व्यवस्था पर विश्वास बढ़ता है और वे राष्ट्र निर्माण में अधिक सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। इसलिए समावेशी विकास और सामाजिक न्याय राष्ट्रीय एकता के महत्वपूर्ण आधार हैं।
विविधता में एकता ही भारत की सबसे बड़ी ताकत
भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। अलग-अलग भाषाएँ, खानपान, वेशभूषा, लोककलाएँ और परंपराएँ हमारी राष्ट्रीय पहचान को समृद्ध बनाती हैं। इन विविधताओं के बावजूद संविधान, लोकतांत्रिक मूल्य और साझा राष्ट्रीय भावना हमें एकजुट रखते हैं।
राष्ट्रीय एकता का अर्थ सभी नागरिकों का एक जैसा होना नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारों, आस्थाओं और परंपराओं का सम्मान करते हुए एक राष्ट्र के रूप में साथ आगे बढ़ना है। परस्पर सम्मान, सहिष्णुता और संवाद की संस्कृति समाज में विश्वास को मजबूत करती है।
जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव या वैमनस्य की भावना राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती है। इसके विपरीत, समानता, न्याय और भाईचारे पर आधारित सामाजिक व्यवस्था देश को मजबूत बनाती है। इसलिए प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह अपने व्यवहार और कार्यों से सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा दे।

अशोक कुमार चन्द्रवंशी
सहायक जनसंपर्क अधिकारी
राष्ट्रीय एकता में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका
भारत की युवा आबादी राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। युवाओं की सोच, ऊर्जा और तकनीकी दक्षता देश के भविष्य को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। ऐसे में युवाओं को राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति जागरूक करना आवश्यक है।
शिक्षा संस्थानों, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से युवाओं में आपसी सम्मान, सहयोग और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित की जा सकती है। डिजिटल माध्यमों के इस दौर में तथ्यात्मक जानकारी साझा करना, अफवाहों से बचना और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना भी नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
यदि युवा संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के व्यापक हितों को प्राथमिकता दें, तो भारत की एकता और विकास को नई गति मिल सकती है।
मजबूत राष्ट्र के लिए सामूहिक संकल्प जरूरी
लोकतंत्र की स्थिरता, स्वतंत्रता की रक्षा और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए राष्ट्रीय एकता और अखंडता अनिवार्य हैं। एक मजबूत राष्ट्र वही है, जहाँ नागरिकों के बीच विश्वास हो, सभी को आगे बढ़ने के अवसर मिलें और मतभेदों का समाधान संवाद एवं संवैधानिक मूल्यों के आधार पर किया जाए।
राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, विविधताओं का सम्मान करना और समाज में सद्भाव बनाए रखना राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने दृढ़ नेतृत्व से जिस एकीकृत भारत की नींव रखी, उसे मजबूत बनाए रखना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। राष्ट्रीय एकता दिवस हमें यही संदेश देता है कि देश की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों की एकजुटता, आपसी विश्वास और साझा संकल्प में निहित है।
आइए, राष्ट्रीय एकता दिवस पर हम संकल्प लें कि जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर देश की एकता, अखंडता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करेंगे तथा एक समावेशी, सशक्त और विकसित भारत के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएगे।







