कृत्रिम गर्भाधान और नस्ल सुधार ने बदली डेयरी की तस्वीर, 40-50 गायों से 300 से 350 लीटर दूध का उत्पादन
रायपुर। कभी घर-परिवार की परंपरा के रूप में किया जाने वाला गौपालन आज लुण्ड्रा विकासखंड के ग्राम पंचायत दोरना निवासी राजनाथ यादव के लिए एक व्यवस्थित और सफल व्यवसाय बन चुका है। पीढ़ियों से चले आ रहे पशुपालन को उन्होंने आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक पशु प्रबंधन और बेहतर नस्ल सुधार से जोड़कर डेयरी को परिवार की मजबूत आजीविका का आधार बना दिया है।
राजनाथ के डेयरी फार्म में आज करीब 40 से 50 गायें हैं और इनसे प्रतिदिन लगभग 300 से 350 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। डेयरी व्यवसाय से उन्हें सालाना करीब 10 से 12 लाख रुपये तक का मुनाफा होने की बात वे बताते हैं। उनकी यह यात्रा बताती है कि परंपरा में आधुनिक तकनीक का समावेश हो तो पशुपालन रोजगार और आय का मजबूत साधन बन सकता है।

पिता से मिली पशुपालन की विरासत
राजनाथ बताते हैं कि उनके परिवार में उनके पिता के समय से ही गौपालन किया जाता रहा है। पहले परिवार में स्थानीय नस्ल की गायों के साथ भैंस भी पाली जाती थी। पशुपालन परिवार की जरूरतों से जुड़ा था, लेकिन समय के साथ राजनाथ ने इसे व्यवस्थित व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला किया।
उन्होंने एचएफ नस्ल की गायें खरीदीं और इसके बाद पशु चिकित्सा विभाग के सहयोग से उन्नत नस्ल के सीमन से कृत्रिम गर्भाधान की तकनीक अपनानी शुरू की। यहीं से उनके डेयरी व्यवसाय में बदलाव की नई शुरुआत हुई।
अब अपने ही फार्म में तैयार हो रही उन्नत नस्ल की बछिया
कृत्रिम गर्भाधान और नस्ल सुधार का फायदा राजनाथ को अपने ही डेयरी फार्म में दिखाई देने लगा। बेहतर नस्ल की बछिया अब उनके फार्म पर ही तैयार हो रही हैं। इससे डेयरी का विस्तार करने के लिए बाहर से बार-बार नई गाय खरीदने की जरूरत कम हुई है।
इस तकनीक ने न केवल पशुधन की गुणवत्ता सुधारने में मदद की, बल्कि राजनाथ को अपने डेयरी फार्म के भविष्य की योजना बनाने का अवसर भी दिया है।
उनके लिए यह बदलाव केवल पशुओं की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। बेहतर नस्ल, बेहतर प्रबंधन और बेहतर उत्पादन—इन तीनों को उन्होंने डेयरी व्यवसाय की आधारशिला बनाया है।

300 से 350 लीटर दूध रोजाना
नस्ल सुधार के साथ पशुओं के बेहतर प्रबंधन का असर दुग्ध उत्पादन पर भी पड़ा है। वर्तमान में राजनाथ के फार्म में करीब 40 से 50 गायें हैं, जिनसे रोजाना 300 से 350 लीटर तक दूध का उत्पादन हो रहा है।
दूध की नियमित बिक्री से परिवार को लगातार आमदनी प्राप्त होती है। राजनाथ के अनुसार डेयरी से होने वाला सालाना मुनाफा करीब 10 से 12 लाख रुपये तक पहुंच रहा है।
इस नियमित आय ने डेयरी को उनके परिवार की आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण आधार बना दिया है।
पशु चिकित्सा विभाग का मार्गदर्शन बना सहारा
राजनाथ की सफलता की कहानी में तकनीक के साथ पशु चिकित्सा विभाग का मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विभाग के अधिकारी और कर्मचारी समय-समय पर उनके पशुओं की देखरेख के लिए पहुंचते हैं।
पशुओं के स्वास्थ्य, टीकाकरण, नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान और बेहतर पशु प्रबंधन से जुड़ी जानकारी उन्हें उपलब्ध कराई जाती है। इस तकनीकी सहयोग से राजनाथ को अपने डेयरी व्यवसाय को वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिली।
वे बताते हैं कि पशुओं की सेहत और नस्ल पर ध्यान देने के साथ ही डेयरी का उत्पादन बेहतर हुआ है।
सम्मान ने बढ़ाया आत्मविश्वास
राजनाथ को उन्नत किसान के रूप में सम्मानित भी किया जा चुका है। यह सम्मान उनके लिए केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि आगे और बेहतर काम करने की प्रेरणा भी बना।
वे कहते हैं कि पशुधन विकास और डेयरी गतिविधियों को मिल रहा प्रोत्साहन ग्रामीण पशुपालकों के लिए नए अवसर पैदा कर रहा है। राजनाथ ने पशुधन विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया है। उन्होंने पशु चिकित्सा विभाग द्वारा समय-समय पर दिए जा रहे मार्गदर्शन और सहयोग के लिए भी धन्यवाद दिया।
जब परंपरा ने थामा तकनीक का हाथ
राजनाथ यादव की ‘सेवा की कहानी’ सिर्फ एक डेयरी फार्म के विस्तार की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की तस्वीर है, जहां पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर नई आर्थिक संभावनाएं तैयार की जा रही हैं।
स्थानीय नस्लों से शुरू हुआ सफर एचएफ नस्ल की गायों, कृत्रिम गर्भाधान और नस्ल सुधार तक पहुंचा। अब उनके अपने फार्म में उन्नत नस्ल की बछिया तैयार हो रही हैं और रोजाना सैकड़ों लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है।
राजनाथ ने साबित किया है कि पशुपालन को यदि वैज्ञानिक सोच, तकनीकी मार्गदर्शन और निरंतर मेहनत का साथ मिल जाए, तो गांव में किया जाने वाला पारंपरिक गौपालन भी एक मजबूत और लाभकारी डेयरी व्यवसाय का रूप ले सकता है।







