सावन में हर-हर महादेव की गूंज, लेकिन मंदिर की दीवारें सुनाती हैं नागवंशी राजाओं, शिल्पकारों और प्राचीन संस्कृति की दास्तान
रायपुर।सावन के महीने में भगवान शिवशंकर की विशेष आराधना का दिन होता है, ऐसे में देशभर के शिवमंदिरों सहित छत्तीसगढ़ में हर तरफ ओम नम शिवाय की गूंज देखी जा रही है। ठीक इसी तरह से भोरमदेव मंदिर में भी हर-हर महादेव के जयकारों और घंटियों की गूंज से पूरा परिसर शिवमय हो रहा है। आपको बता दें कि कवर्धा से करीब 18 किलोमीटर दूर चौरागांव में मैकल पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं है। इसकी दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां और शिल्प करीब एक हजार साल पुराने इतिहास, संस्कृति और तत्कालीन सामाजिक जीवन की कहानी बयां करते हैं।

छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है
खजुराहो जैसी शिल्पकला के कारण भोरमदेव को ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है। इसीलिए भोरमदेव को सिर्फ एक प्राचीन शिव मंदिर कहना इसकी पहचान को सीमित कर देना होगा। यह वह धरोहर है, जहां शिवभक्ति के साथ छत्तीसगढ़ के इतिहास, स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत की कहानी आज भी पत्थरों में जीवित है।
सावन में दर्शन के साथ इतिहास को करीब से जानने का मौकासावन में भोरमदेव पहुंचने वाले श्रद्धालु शिवलिंग के दर्शन कर आस्था प्रकट करते हैं, लेकिन अगर मंदिर की दीवारों और शिल्प को गौर से देखा जाए तो यहां एक दूसरी दुनिया भी नजर आती है। यह दुनिया उन राजवंशों, कलाकारों, शिल्पकारों और समाज की है, जिन्होंने सदियों पहले पत्थरों में अपनी संस्कृति को दर्ज कर दिया था।
नागवंशी राजाओं की राजधानी रहा भोरमदेवभोरमदेव क्षेत्र का इतिहास नागवंशी राजाओं से गहराई से जुड़ा रहा है। जिला प्रशासन की जानकारी के मुताबिक करीब 9वीं से 14वीं शताब्दी के बीच यह क्षेत्र नागवंशी शासकों की राजधानी रहा। इसके बाद हैहयवंशी शासकों का भी यहां प्रभाव रहा। मंदिर परिसर और आसपास मौजूद पुरातात्विक अवशेष इस पूरे क्षेत्र की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत के प्रमाण हैं।

एक अभिलेख ने खोला मंदिर के इतिहास का राजभोरमदेव मंदिर के इतिहास को समझने में यहां मिले अभिलेख महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मंदिर के मंडप में स्थित प्रतिमा के आधार पर मिले लेख में फणिनागवंशी शासक गोपालदेव का उल्लेख मिलता है। इसी आधार पर ऐतिहासिक अध्ययनों में मंदिर के निर्माण को करीब 11वीं शताब्दी के आसपास का माना जाता है। हालांकि निर्माण काल को लेकर अलग-अलग स्रोतों में मतभेद हैं, लेकिन मंदिर की प्राचीनता और स्थापत्य महत्व पर कोई सवाल नहीं है।
नागर शैली में पत्थरों पर उकेरी गई अद्भुत कलाभोरमदेव मंदिर नागर स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। पूर्व दिशा की ओर मुख किए मंदिर को ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है। मंदिर में तीन दिशाओं से प्रवेश की व्यवस्था है। मंडप के स्तंभों पर की गई बारीक नक्काशी तत्कालीन शिल्पकारों की अद्भुत कला-कुशलता को सामने लाती है।
ऐतिहासिक मंदिरों की कतार में अलग पहचानमंदिर की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं के साथ वाद्य यंत्र बजाते कलाकार, नृत्य मुद्राएं और तत्कालीन जीवन से जुड़े कई दृश्य उकेरे गए हैं। यही शिल्प भोरमदेव को देश के प्रमुख ऐतिहासिक मंदिरों की कतार में अलग पहचान दिलाता है।
मंदिर परिसर से बाहर भी बिखरी है इतिहास की विरासतभोरमदेव की ऐतिहासिक पहचान केवल मुख्य मंदिर तक सीमित नहीं है। आसपास स्थित छेरकी महल और मड़वा महल जैसे स्थल इस क्षेत्र की विरासत को और समृद्ध करते हैं। दूसरी ओर मैकल की पहाड़ियों, हरियाली और वन क्षेत्र से घिरा यह इलाका धार्मिक पर्यटन के साथ प्राकृतिक आकर्षण भी रखता है। भोरमदेव अभयारण्य इस पूरे क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान को और मजबूत करता है।








