अरुणाचल प्रदेश की मध्य पहाड़ियों में संभावित फसलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए ICAR बसार में किसान फील्ड डे आयोजित
बसार, 26 अक्टूबर 2026। अरुणाचल प्रदेश के मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में फसल विविधीकरण, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से ICAR के पूर्वोत्तर क्षेत्र अनुसंधान परिसर, अरुणाचल प्रदेश केंद्र, बसार द्वारा गोरी स्थित अनुसंधान फार्म में ‘संभावित फसलों की खेती’ विषय पर फील्ड डे आयोजित किया गया। कार्यक्रम अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान नेटवर्क (AICRN) के अंतर्गत हुआ, जिसमें 18 पुरुषों और 16 महिलाओं सहित कुल 34 किसानों एवं कृषि क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया।


वरिष्ठ वैज्ञानिक (Agronomy) डॉ. संजय कुमार पांडेयने खेती की तकनीकों और संभावित फसलों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने जॉब्स टियर्स, सोयाबीन और विंग्ड बीन की खेती के लिए आवश्यक कृषि पद्धतियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सोयाबीन और विंग्ड बीन जैसी दलहनी फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायक होती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है। विशेषज्ञों ने बताया कि इन फसलों को अपनाने से किसानों को फसल विविधीकरण, पोषण सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन और ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ करने में मदद मिल सकती है।
क्षेत्रीय केंद्र के कार्यवाहक प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डोनी जिनी ने उपयुक्त कृषि पद्धतियों को अपनाने की आवश्यकता बताई। वहीं, कृषि विज्ञान केंद्र पश्चिम सियांग के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार ने वैज्ञानिक तकनीकों और किसान-केंद्रित विस्तार गतिविधियों पर जोर दिया। लेपाराडा जिला कृषि कार्यालय की कृषि विकास अधिकारी श्रीमती बिप्पी करबाक ने अनुसंधान संस्थानों, कृषि विभाग और किसानों के बीच समन्वय को महत्त्वपूर्ण बताया।
तकनीकी सत्र में मृदा विज्ञान की वैज्ञानिक डॉ. अम्पी तासुंग ने अरुणाचल प्रदेश में संभावित फसलों के महत्त्व, फसल विविधीकरण और जलवायु अनुकूल कृषि पर विचार रखे। तकनीकी कार्मिक श्री भोबेन पैत ने विंग्ड बीन, पेरिला और जॉब्स टियर्स की खेती की विधियों तथा स्थानीय जलवायु में उनकी उपयुक्तता के बारे में जानकारी दी।
कार्यक्रम के दौरान ICAR के वैज्ञानिकों, कृषि विज्ञान केंद्र पश्चिम सियांग और जिला कृषि कार्यालय लेपाराडा के प्रतिनिधियों ने किसानों के साथ संवाद किया। इसमें खेती की तकनीकों, उत्पादन संबंधी चुनौतियों और संभावित फसलों के विस्तार की संभावनाओं पर चर्चा हुई। डॉ. थेजांगुली अंगामी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।








